खैरागढ़: सर्रागोंदी स्कूल विवाद की जांच में ‘खेला’, मीडिया में आरोप और कागजों पर ‘क्लीन चिट’ से गहराया संदेह

– जांच टीम के सामने पत्रकार ने सौंपे डिजिटल साक्ष्य, उधर ग्रामीणों से शिक्षिका के पक्ष में हस्ताक्षर कराने का आरोप
– ‘मैडम’ को बचाने की कवायद? मौके पर मौजूद चश्मदीदों के बजाय बाहरी लोगों के बयान दर्ज करने पर उठे सवाल
खैरागढ़— छत्तीसगढ़ के खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (KCG) जिले के सर्रागोंदी प्राथमिक शाला में पत्रकार से अभद्रता और ‘चप्पल कांड’ की धमकियों का मामला गुरुवार को उस समय और गरमा गया, जब प्रशासनिक जांच के दौरान भारी विसंगतियां देखने को मिलीं। एक ओर जहां ग्रामीणों ने मीडिया के कैमरों के सामने शिक्षिका के व्यवहार को अनुचित बताया, वहीं दूसरी ओर जांच अधिकारियों द्वारा तैयार प्रतिवेदन में शिक्षिका को ‘निर्दोष’ बताए जाने की बात सामने आ रही है। इस विरोधाभास ने पूरी जांच प्रक्रिया को ही संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है।
जांच का घटनाक्रम: घंटों चली गहमागहमी
निर्धारित समय के अनुसार, सुबह 9 बजे जांच टीम प्राथमिक शाला सर्रागोंदी पहुंची। जांच अधिकारी रविंद्र कुमार चावड़ा (प्राचार्य, चिचोला) और सतीश टांडेकर (प्रभारी प्राचार्य, देवरी) ने दोनों पक्षों के बयान दर्ज किए। इस दौरान शिकायतकर्ता पत्रकार राजेंद्र चंदेल और प्रधानपाठिका प्राची पाठक उपस्थित रहीं। विशेष बात यह रही कि लंबे समय से अनुपस्थित रहने वाली शिक्षिका ज्योति गहलोत भी इस दौरान विद्यालय में मौजूद दिखीं।
साक्ष्यों की पोटली: वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग सौंपी
पत्रकार राजेंद्र चंदेल ने जांच अधिकारियों के समक्ष अपने पक्ष को मजबूती से रखते हुए घटना के समय की वीडियो और वॉइस रिकॉर्डिंग पेश की। चंदेल का आरोप है कि जब वे बयान देने पहुंचे, तो प्रधानपाठिका और उनके पति विभाष पाठक पहले से ही जांच अधिकारियों के साथ अंदर बैठे थे। उन्होंने मांग की है कि प्रशासन इन डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर कड़ी कार्रवाई करे ताकि भविष्य में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के साथ ऐसी अमर्यादित घटना न हो।
विरोधाभास: मीडिया के सामने आक्रोश, कागजों पर ‘सब ठीक’
आज की जांच में सबसे चौंकाने वाला पहलू ग्रामीणों का रुख रहा।
ग्रामीणों का बयान: विद्यालय से बाहर आए ग्रामीणों ने मीडिया को स्पष्ट बताया कि प्रधानपाठिका प्राची पाठक का व्यवहार न केवल पत्रकार के साथ, बल्कि ग्रामीणों के साथ भी अक्सर अभद्र रहता है। उन्होंने दोनों शिक्षिकाओं को तत्काल स्कूल से हटाने की मांग की।
प्रतिवेदन पर सवाल: ग्रामीणों का आरोप है कि जांच के अंत में एक ऐसा प्रतिवेदन तैयार किया गया, जिसमें शिक्षिका को क्लीन चिट देते हुए पत्रकार को ही गलत ठहराया गया है। सूत्रों के अनुसार, इस कागजी रिपोर्ट पर उन लोगों के हस्ताक्षर लिए गए, जो घटना के वक्त स्कूल में मौजूद ही नहीं थे, जबकि वास्तविक चश्मदीदों के बयानों को नजरअंदाज करने की कोशिश की गई।
मुख्य सवाल: क्या रसूख के आगे दब जाएगी सच्चाई?
जांच की पारदर्शिता पर उठते सवालों ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है:
जब ग्रामीण कैमरे पर शिक्षिका के खिलाफ हैं, तो विभागीय रिपोर्ट में उन्हें ‘सही’ कैसे ठहराया गया?
क्या शिक्षा विभाग अपने रसूखदार स्टाफ को बचाने के लिए तथ्यों से छेड़छाड़ कर रहा है?
क्या पत्रकार द्वारा सौंपे गए डिजिटल साक्ष्यों को जांच रिपोर्ट का हिस्सा बनाया जाएगा?
निष्कर्ष:
फिलहाल, सर्रागोंदी की इस ‘स्पॉट जांच’ ने न्याय के बजाय नए विवादों को जन्म दे दिया है। यदि जांच रिपोर्ट पक्षपाती पाई जाती है, तो जिला पत्रकार संघ और ग्रामीणों के आक्रोश का सामना प्रशासन को करना पड़ सकता है। अब सबकी नजरें अंतिम आधिकारिक रिपोर्ट पर टिकी हैं।


