आरटीई के प्रावधानों के अनुसार सभी गैर अनुदान प्राप्त और गैर अल्पसंख्यक प्राइवेट स्कूलों की 25% सीट दुर्बल और असुविधा ग्रस्त परिवार के बच्चों के लिए आरक्षित होती है, उचित ही है ।
यह ना तो सिर्फ लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को परिलक्षित करती है, वरन् कमजोर तबकों के प्रति हमारी सरकारों की प्रतिबद्धता को इंगित भी करती है ।
चूकिं प्राइवेट संस्थान स्ववित्तपोषित होते हैं और छात्रों से एकत्रित शुल्क ही उनकी आय का एकमात्र जरिया होता है । अतः इसकी पूर्ति के लिए सरकारों ने प्रतिपूर्ति की व्यवस्था भी की।
किंतु आश्चर्य की बात है कि एक दशक से भी पहले तय की गई राशि आज भी उतनी ही है , जबकि महंगाई कई गुना बढ़ गई । एक आकलन के अनुसार प्राइमरी के एक बच्चे के लिए सरकार के द्वारा अधिकतम दी जाने वाली वार्षिक प्रतिपूर्ति मात्र ₹7600 है जबकि सरकारी विद्यालयों में एक बच्चे के ऊपर सरकार इसके 3 गुने से भी ज्यादा का खर्च करती है। अर्थात संस्थान को एक तिहाई ही प्राप्त हो पाता है। वह भी समय से नहीं यह बहुत बड़ी विडंबना है।
अब यक्ष प्रश्न यह है संस्थाओं को होने वाली इस आय के कमी की पूर्ति करेगा कौन?
या तो उन छात्रों के पालक जो कि शुल्क जमा कर रहे हैं , अधिक शुल्क चुका कर या फिर वे निरीह शिक्षक जो वास्तव में अपनी सेवाओं के बदले काफी कम मूल्य पर गुजारा कर रहे हैं , कम वेतन पाकर ?
मैं आपसे एक प्रश्न करता हूं , यदि कोई व्यक्ति आज मजदूरी कर रहा है तो उसका मेहनताना कब मिलना चाहिए ?
1 महीने में, 2 महीने में 3 महीने में, 6 महीने में ,साल भर में..... आखिर कितने दिनों में शिक्षकों और संस्था के इस कार्य की मजदूरी (प्रतिपूर्ति) मिलनी चाहिए?
एक-दो वर्षों का विलंब तो बहुत आम है।
यह मिलेगी भी या लालफीताशाही की शिकार होगी पता नहीं ।
क्या हमारी सरकारी व्यवस्था इतनी अच्छी नहीं हो सकती कि समय पर राशि का आवंटन किया जा सके । वो भी जब हमारी सभ्यता इतनी भयंकर महामारी से गुजर रही है ।
क्या "गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु" वाले वाक्य या फिर " गुरु गो विंद दोऊ खड़े काके लागू पाय" वाले वाक्य लेखो तक ही सिमट के रह जाएंगे?
क्या संवेदनाएं इतनी शून्य हो जाएंगी ?