कलम और कैमरे पर खाकी का वार, पत्रकार को सरेआम पीटा
बंसल न्यूज के संवाददाता किशोर सोनी की पिटाई का वीडियो वायरल, थाने के सामने पत्रकारों का धरना; पुलिस की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल

खैरागढ़। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर खाकी के प्रहार ने खैरागढ़ में पुलिस की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। राज्योत्सव जैसे गरिमामय सरकारी आयोजन की कवरेज कर रहे बंसल न्यूज के संवाददाता एवं खैरागढ़ जिला पत्रकार संघ के सदस्य किशोर सोनी के साथ पुलिसकर्मियों ने मारपीट की। घटना का वीडियो सामने आने के बाद जिले के पत्रकारों में भारी आक्रोश है। पत्रकारों ने थाने के सामने धरना देकर दोषी पुलिसकर्मियों पर कठोर कार्रवाई की मांग उठाई है।
कैमरे के सामने पत्रकार से मारपीट, वीडियो ने खोली पुलिस की कार्यप्रणाली की पोल
जानकारी के अनुसार, राज्योत्सव कार्यक्रम के दौरान किशोर सोनी समाचार संकलन कर रहे थे। इसी दौरान पुलिसकर्मियों के साथ उनका विवाद हुआ और पुलिसकर्मियों ने उनके साथ मारपीट की। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें पुलिसकर्मियों द्वारा पत्रकार के साथ हाथापाई और मारपीट किए जाने के दृश्य दिखाई दे रहे हैं। सार्वजनिक आयोजन के दौरान हुई इस घटना ने पुलिस के व्यवहार और पत्रकारों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि समाचार संकलन कर रहे पत्रकार के साथ पुलिस को मारपीट करने की नौबत क्यों आई? यदि पत्रकार के किसी आचरण पर पुलिस को आपत्ति थी तो क्या उसके लिए कानून के तहत कार्रवाई का रास्ता उपलब्ध नहीं था? आखिर किस अधिकार से पुलिसकर्मियों ने कानून की प्रक्रिया छोड़कर हाथ उठाए?
थाने के सामने पत्रकारों का मोर्चा, कार्रवाई की मांग पर अड़े
घटना के विरोध में जिला पत्रकार संघ के सदस्यों सहित जिले के अन्य पत्रकार थाने के सामने धरने पर बैठ गए हैं। पत्रकारों ने संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध निष्पक्ष जांच, कठोर वैधानिक कार्रवाई और पीड़ित पत्रकार को सुरक्षा प्रदान करने की मांग की है। पत्रकारों का स्पष्ट कहना है कि समाचार संकलन करना उनका पेशेवर दायित्व है। किसी खबर की कवरेज के दौरान पुलिस को कोई आपत्ति होती है तो उसका समाधान कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना चाहिए। पत्रकार के साथ मारपीट किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। पत्रकारों ने पुलिस प्रशासन से पूरे मामले में जवाबदेही तय करने की मांग की है।
जब पत्रकार ही सुरक्षित नहीं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?
यह घटना केवल एक पत्रकार के साथ मारपीट तक सीमित नहीं है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रेस की गरिमा से जुड़ा गंभीर सवाल है। पत्रकार का काम सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछना, घटनाओं को सामने लाना और जनता तक सच्चाई पहुंचाना है। यदि समाचार संकलन करने वाले पत्रकार ही पुलिस के हाथों सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिक पुलिस से सुरक्षा और न्याय की उम्मीद कैसे करेगा? पुलिस का दायित्व कानून व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। वर्दी की गरिमा उसके अनुशासन और कानून के प्रति जवाबदेही से तय होती है, न कि उसकी ताकत के प्रदर्शन से। ऐसे में राज्योत्सव जैसे सार्वजनिक आयोजन में पत्रकार के साथ हुई मारपीट ने पुलिस के आचरण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब पुलिस प्रशासन की परीक्षा, कार्रवाई होगी या मामला दब जाएगा?
वीडियो सामने आने और पत्रकारों के धरने पर बैठने के बाद अब जिला पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कराए। वीडियो में दिखाई दे रहे घटनाक्रम और संबंधित पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच कर दोषियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। यदि पुलिसकर्मी दोषी पाए जाते हैं तो उनके विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई होनी चाहिए। अब देखना यह है कि पुलिस प्रशासन अपने ही विभाग के कर्मचारियों पर कार्रवाई करने का साहस दिखाता है या फिर विभागीय जांच और औपचारिक आश्वासनों के बीच मामला उलझकर रह जाता है। सवाल सीधा है क्या पत्रकार को कैमरा लेकर सच दिखाने की कीमत पुलिस की मार खाकर चुकानी पड़ेगी. कलम और कैमरे की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। इसे किसी भी सूरत में पुलिसिया दबाव और बल प्रयोग से कुचला नहीं जा सकता।




