समाज को ₹35 हजार दिए, भोज कराया, फिर भी बहिष्कार! अंतरजातीय विवाह करने वाले अधिवक्ता दंपती ने खोला मोर्चा
दैनिक सरस्वती संकेत | खैरागढ़
खैरागढ़। संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और अपनी पसंद से विवाह करने के अधिकार के बावजूद सामाजिक बहिष्कार जैसी कुप्रथाएं आज भी कई परिवारों के लिए पीड़ा का कारण बनी हुई हैं। अंतरजातीय विवाह करने वाले एक अधिवक्ता दंपती ने आरोप लगाया है कि समाज के कहने पर उन्होंने ₹35 हजार की राशि दी और समाज का भोज भी कराया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें समाज से बाहर कर दिया गया। न्याय की उम्मीद में दंपती ने पुलिस अधीक्षक से शिकायत कर दोषियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि उन सामाजिक कुरीतियों पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है जो संविधान और कानून से ऊपर खुद को मानने की कोशिश करती हैं। यदि किसी व्यक्ति को उसकी जाति, विवाह या व्यक्तिगत निर्णय के कारण सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, तो यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
दोषियों पर हो कठोर कार्रवाई
सामाजिक बहिष्कार, धमकी, मानसिक प्रताड़ना और जबरन आर्थिक वसूली जैसे मामलों में यदि अपराध के तत्व पाए जाते हैं तो पुलिस को निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे मामलों में सख्ती ही समाज में सकारात्मक संदेश दे सकती है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
संपादकीय टिप्पणी
भारत का संविधान प्रत्येक बालिग नागरिक को अपनी इच्छा से विवाह करने का अधिकार देता है। अंतरजातीय विवाह सामाजिक समरसता और समानता को बढ़ावा देने का माध्यम है। किसी भी व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार करना, उसे अपमानित करना या आर्थिक दबाव बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। प्रशासन को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और दृढ़ता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति इस प्रकार की सामाजिक प्रताड़ना का शिकार न हो।
— राजेंद्र सिंह चंदेल
संपादक, दैनिक सरस्वती संकेत





