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न्यायालय के आदेश को रौंदकर रजिस्ट्री! निरस्त खसरे पर खेल: पटवारी छेदीलाल जांगड़े पर फर्जीवाड़े के गंभीर आरोप

न्यायालय के आदेश को रौंदकर रजिस्ट्री!

निरस्त खसरे पर खेल: पटवारी छेदीलाल जांगड़े पर फर्जीवाड़े के गंभीर आरोप

खैरागढ़ जिले में राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करने वाला मामला सामने आया है। न्यायालय द्वारा निरस्त घोषित खसरे के आधार पर वर्षों बाद भूमि की रजिस्ट्री करा दी गई, और जिम्मेदार अधिकारी आज तक बेखौफ हैं। यह मामला केवल लापरवाही नहीं, बल्कि न्यायालयीन आदेशों की खुली अवहेलना और सुनियोजित फर्जीवाड़े की ओर इशारा करता है।

वार्ड क्रमांक 09, इतवारी बाजार निवासी मनीष सोनी ने सोमवार को रेस्ट हाउस में प्रेस वार्ता कर राजस्व विभाग के पटवारी छेदीलाल जांगड़े पर गंभीर आरोप लगाए और उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग की।

2015 में ही खत्म हो चुका था खसरा, फिर 2021 में कैसे जिंदा हुआ?

खोजी पड़ताल में सामने आया है कि ग्राम सोनेसरार, पटवारी हल्का क्रमांक 30 की भूमि खसरा नंबर 182/6 को अपर जिला न्यायाधीश न्यायालय ने 22 दिसंबर 2015 को स्पष्ट रूप से गलत, फर्जी और निरस्त घोषित कर दिया था।

इस आदेश के बाद न तो यह खसरा राजस्व रिकॉर्ड में जीवित रह सकता था और न ही इसके आधार पर कोई लेन-देन संभव था।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि न्यायालयीन आदेश के छह साल बाद, 18 अगस्त 2021 को इसी निरस्त खसरे के आधार पर रजिस्ट्री करा दी गई।तहसील ने भी माना था रिकॉर्ड फर्जी ,यह मामला यहीं नहीं रुकता। न्यायालयीन आदेश से पहले ही 24 मार्च 2015 को तहसील कार्यालय ने पुनरावलोकन करते हुए पुराने पटवारी रिकॉर्ड,पर्चा ऋण पुस्तिका,संबंधित राजस्व प्रविष्टियां,सभी को खारिज कर दिया था। अर्थात न तहसील स्तर पर और न ही न्यायालय स्तर पर खसरा 182/6 को कोई वैधानिक संरक्षण प्राप्त था।

पटवारी की भूमिका सवालों के घेरे में

आरोप है कि पटवारी छेदीलाल जांगड़े ने

निरस्त खसरे

निरस्त पर्चा

निरस्त नक्शे

के आधार पर रजिस्ट्री प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। यदि यह तथ्य सही है, तो यह पद का दुरुपयोग, रिकॉर्ड में हेराफेरी और राज्य के कानून को खुली चुनौती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायालय के आदेश के बाद किसी भी राजस्व कर्मचारी को विपरीत प्रविष्टि करने का कोई अधिकार नहीं होता।

यह राजस्व विवाद नहीं, सीधा आपराधिक मामला

आवेदक मनीष सोनी का कहना है कि यह मामला अब सीमांकन या रिकॉर्ड सुधार का नहीं, बल्कि सुनियोजित आपराधिक धोखाधड़ी (Fraud) का है।

उन्होंने मांग की है कि प्रकरण में भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 198, 199, 318 एवं 3(5) के तहत अपराध पंजीबद्ध किया जाए।

7 दिन का अल्टीमेटम: आदेश दिखाओ या FIR झेलो

मनीष सोनी ने प्रशासन को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि यदि खसरा 182/6 के पक्ष में कोई भी उच्च न्यायालय का आदेश मौजूद है, तो उसकी प्रमाणित प्रति 7 दिनों के भीतर सार्वजनिक की जाए।

अन्यथा इसे रिकॉर्ड में जानबूझकर की गई हेराफेरी मानते हुए थाना खैरागढ़ में तत्काल FIR दर्ज की जाए।

प्रशासन की चुप्पी भी संदेह के घेरे में

सबसे गंभीर सवाल यह है कि

वर्षों पुराने न्यायालयीन आदेश मौजूद हैं

तहसील स्तर पर रिकॉर्ड खारिज हो चुका है

फिर भी रजिस्ट्री हो जाती है

तो जिम्मेदारी केवल पटवारी तक सीमित कैसे हो सकती है?

क्या इस पूरे प्रकरण में ऊपरी संरक्षण प्राप्त है?

क्या राजस्व तंत्र के अन्य अधिकारी भी इस चुप्पी में भागीदार हैं?

जनहित में कार्रवाई जरूरी

आवेदक ने कहा कि यदि समय रहते दोषियों पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला आम नागरिकों की भूमि सुरक्षा पर बड़ा खतरा बन जाएगा।

उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि न्यायालयीन आदेशों का सम्मान करते हुए दोषी अधिकारी पर कठोर कार्रवाई की जाए और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

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